निडरता की मिसाल: जब सब खामोश थे, तब शाहिद बलतिस्तानी ने बुलंद की अपनी आवाज़

नई दिल्ली: हाल ही में ईरान और इज़राइल के बीच बढ़ते तनाव के दौरान एक तरफ जहाँ दुनिया के बड़े-बड़े देशों के नेता अमेरिका और इज़राइल के खिलाफ बोलने से कतरा रहे थे, वहीं दूसरी ओर शिया समुदाय के ‘नौहाख्वानों’ (मजहबी कलाम पढ़ने वाले) की चुप्पी ने भी लोगों को हैरान कर दिया।
दबाव और डर का माहौल
खबरों की मानें तो कई मशहूर नौहाख्वानों ने अमेरिका की आलोचना तो की, लेकिन बहुत ही हल्के शब्दों में। इसका एक बड़ा कारण यूट्यूब चैनल डिलीट होने का डर और यूरोप का वीज़ा न मिलने का खतरा बताया जा रहा है। लोगों का कहना है कि इन कलाकारों ने शहीद अयातुल्लाह ख़ामेनई पर दुख तो जताया, लेकिन अपने आधिकारिक यूट्यूब प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल करने के बजाय सिर्फ फेसबुक या ट्विटर पर अपनी बात रखी ताकि उनके मुख्य चैनल सुरक्षित रहें।
जनता के सवाल और पत्रकार की मुहिम
इस खामोशी को देखकर आम जनता के बीच यह सवाल उठने लगा कि जो लोग कर्बला के नाम पर नौहा पढ़ते हैं, वे आज ईरान के समर्थन में या शहीद ख़ामेनई की याद में अपना कलाम जारी क्यों नहीं कर रहे?
इसी मुद्दे को भारतीय पत्रकार और यूट्यूबर मोहम्मद रज़ा ने प्रमुखता से उठाया। उनके सवाल उठाने के बाद कई नौहाख्वानों ने सफाई दी कि वे ईरान के साथ हैं, लेकिन ज़्यादातर बातें सिर्फ दावों तक ही सीमित रहीं।
शाहिद बलतिस्तानी का साहसी कदम
इस पूरे विवाद के बीच सिर्फ एक नाम ऐसा सामने आया जिसने बिना डरे अपनी बात रखी— शाहिद बलतिस्तानी। शाहिद साहब ने किसी पत्रकार की आलोचना करने या बहाने बनाने के बजाय:
- बिना किसी हिचकिचाहट के अपने आधिकारिक यूट्यूब चैनल पर वीडियो जारी किया।
- ईरान और शहीद ख़ामेनई के प्रति अपना समर्थन जताया।
- मिनाब में शहीद हुई लड़कियों को भावपूर्ण श्रद्धांजलि दी।
“शाहिद बलतिस्तानी ने इस बात की परवाह नहीं की कि उनका चैनल डिलीट हो जाएगा या उन्हें भविष्य में कोई नुकसान होगा। उन्होंने इसे अपना धार्मिक और नैतिक कर्तव्य समझा।”
शाहिद बलतिस्तानी के इस कदम की सोशल मीडिया पर काफी सराहना हो रही है। लोग कह रहे हैं कि जहाँ बाकी लोग अपनी कमाई और वीज़ा बचाने में लगे थे, वहीं शाहिद साहब ने हक़ की आवाज़ बुलंद की।
نڈرتا کی مثال: جب سب خاموش تھے، تب شاہد بلتستانی نے حق کی آواز بلند کی
نئی دہلی: حالیہ عالمی حالات میں جہاں دنیا کے بڑے ممالک امریکہ اور اسرائیل کے خلاف بولنے سے کتراتے نظر آئے، وہیں نوحہ خوانوں کی خاموشی نے بھی کئی سوالات کھڑے کر دیے۔
ڈر اور مصلحت پسندی عام طور پر دیکھا گیا کہ بہت سے معروف نوحہ خوانوں نے امریکہ پر تنقید تو کی، مگر بہت دبے الفاظ میں۔ اس کی بڑی وجہ یہ خوف تھا کہ کہیں ان کے یوٹیوب چینلز ڈیلیٹ نہ ہو جائیں یا یورپی ممالک انہیں ویزہ دینے سے انکار نہ کر دیں۔ اگرچہ انہوں نے شہید آیت اللہ خامنہ ای پر تعزیت کا اظہار کیا، لیکن اپنے آفیشل پلیٹ فارمز کے بجائے صرف فیس بک اور ٹویٹر تک محدود رہے۔
صحافی محمد رضا کا سوال شیعہ قوم کے درمیان یہ بے چینی بڑھ رہی تھی کہ جو لوگ کربلا کے نام پر نوحہ خوانی کرتے ہیں، وہ اس مشکل وقت میں ایران کی حمایت اور شہید خامنہ ای کی یاد میں اپنا کلام کیوں جاری نہیں کر رہے؟ اسی بات کو بھارتی صحافی اور یوٹیوب محمد رضا نے اٹھایا، جس کے بعد کئی نوحہ خوانوں کے بیانات سامنے آئے۔
شاہد بلتستانی کا جرات مندانہ اقدام ان تمام حالات میں صرف شاہد بلتستانی وہ واحد نوحہ خوان تھے جنہوں نے کسی تنقید کی پرواہ کیے بغیر اپنے آفیشل یوٹیوب چینل پر ایران اور شہید خامنہ ای سمیت میناب کی شہید لڑکیوں کو خراج عقیدت پیش کیا۔ انہوں نے اپنے کیریئر یا چینل کے نقصان کی پرواہ نہیں کی اور اپنا فرض ادا کیا۔
الگوی شجاعت: وقتی همه سکوت کردند، شاهد بلتستانی صدای حق شد
دهلی نو: در حالی که بسیاری از رهبران جهان از موضعگیری علیه آمریکا و اسرائیل هراس دارند، سکوت برخی از نوحهخوانان مشهور در قبال حوادث اخیر، پرسشهای زیادی را در میان مردم برانگیخته است.
ترس از مصلحت یا از دست دادن منافع گزارشها حاکی از آن است که بسیاری از نوحهخوانان از ترس بسته شدن کانالهای یوتیوب خود یا رد شدن ویزای اروپا، انتقادات خود را بسیار محتاطانه مطرح کردند. اگرچه آنها نسبت به شهادت آیتالله خامنهای ابراز سوگواری کردند، اما این کار را بیشتر در فیسبوک و توییتر انجام دادند تا امنیت کانالهای یوتیوبشان به خطر نیفتد.
اعتراض خبرنگار محمد رضا مردم این سوال را مطرح کردند که کسانی که به نام کربلا نوحه میسازند، چرا اکنون برای حمایت از ایران و شهید خامنهای کلامی منتشر نمیکنند؟ این موضوع توسط محمد رضا، خبرنگار و یوتیوبر هندی، به چالش کشیده شد که واکنشهای متفاوتی را در پی داشت.
شجاعت شاهد بلتستانی در این میان، تنها شاهد بلتستانی بود که بدون هیچ حاشیه و ترس از دست دادن کانال خود، در کانال رسمی یوتیوبش ویدیویی برای ادای احترام به ایران، شهید خامنهای و دختران شهید میناب منتشر کرد. او بدون توجه به مسائل مادی و ویزا، تنها به وظیفه دینی و اخلاقی خود عمل کرد.



